Sunday, September 13, 2020

देश के हालात

आइये आज 2 खबरों पर चर्चा करतें हैं, सबसे पहले मैं दोनो ही खबर की पुष्टि नही कर रहा।

पहली खबर है कि 5 वर्ष तक आप संविदाकर्मी रहेंगे आगे आप स्थायी होंगे कि नही ये आपके कार्य पर निर्भर करेगा(ऐसा कहा ज रहा है पर निर्भर करेगा आपके अधिकारी पर) एक तरह से 5 वर्ष तक ट्रायल चलेगा कि आप योग्य हो कि नहीं। हमारे कुछ अति आदर्शवादी साथी कह रहें है कि इससे कर्मचारी मेहनती बनेगा और कामचोर कर्मचारी बाहर हो जाएगा तरस आता है उन आदर्श साथियों पर क्योकि इसके शिकार वो खुद बनने वाले हैं।

आइये जानते है उसकी वास्तविकता- 5 वर्ष संविदा पर रखना और मूल्यांकन के बाद स्थायी किया जाना बहुत ही खतरनाक स्थिति होगी असल मे मूल्यांकन कार्य का होगा ही नहीं उसी की रिपोर्ट अच्छी होगी जो अधिकारी का प्रिय होगा चापलूस होगा, जैसा होता है अभी भी हर ब्लॉक में मिलने वाले शिक्षक सम्मान को देखतें ही है कि किसे मिलता है जो अधिकारी के करीब होता है और जो मेहनत से पढ़ाता है उसे तो कोई जानता ही नहीं।
दूसरी बड़ी समस्या जब स्थायी का समय आएगा तो रिपोर्ट अच्छी करने के नाम पर कितना शोषण होगा सबको पता है, ऐसे ही शोषण के चलते तो साक्षात्कार खत्म करने की मांग हो रही है। मतलब साफ है जो चापलूस होगा जो पैसे देगा वो स्थायी होगा जो ईमानदार होगा, अपने काम से कम रहेगा वो बाहर होगा।
उस व्यवस्था से कर्मचारी कभी ईमानदारी से कार्य नही कर पायेगा वो सही गलत पर नही बल्कि सिर्फ वही करेगा जो उसका अधिकारी चाहता है। जैसा कि निजी क्षेत्र में होता है।सबसे बड़ी कीमत तो महिलाओं को उठानी होगी जैसा कि हर निजी क्षेत्र में होता है।
बाकी आप इसको सही कहने के कई बहाने खोज सकतें हैं।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण देता हूँ, नेता जनता के मुद्दों पर चुनाव लड़ता है पर पूरे 5 साल वो जनता के लिए नही पार्टी के हित मे कार्य करता है पार्टी सही करे या गलत आवाज नही उठाता क्योकि उसे पता है कि अगर गलत को गलत बोले तो अगले चुनाव में टिकट कट जाएगा 

दूसरी खबर की वास्तविकता खुद चेक कर लीजिए, अगर गलत हो तो दिन भर सरकारी बैंकों को गाली दीजियेगा कुछ चेक पॉइंट बताता हूँ चेक करें-
निजी बैंक में जाये और निम्न बातें चेक करें-

1 आपकी ब्रांच में कितने अकॉउंट है और कितने कर्मचारी
2 कितने जीरो बैलेंस के खाते हैं
3 कौन कौन सी सरकारी योजना का लाभ मिल सकता है
4 कितने कृषि लोन है
5 कितने जनधन खाते है
6 कितने वृद्धा पेंशन के खाते है
7 कितने विधवा पेंशन के खाते हैं
8 कितने सब्सिडी वाले खाते है
9 कितने मुद्रा लोन दिए है
10 कितने एजुकेशन लोन दिए है
11 कितने छोटे लोगो को स्वरोजगार के लिए लोन दिए है
12 कितने छात्रों के खाते हैं
13 कितने किसान निधि के लाभर्तियो के खाते है
14 कितने mdm के बच्चों के खाते है

ऐसे कुछ सवाल है कुछ खुद से जोड़ लें और पूंछे देखिये जवाब  मिलता है कि नही और मिलता है तो सरकारी बैंक जाइयेगा वंहा के आंकड़े मिलान कर लीजियेगा। विस्वास मानिए आपको   जो भी समस्या हो रही है वो तो रहेगी पर सरकारी बैंकों के प्रति साजिश का पता जरूर चलेगा कि हर दिन एक योजना जोड़ देते है और हर दिन कर्मचारी भी कम कर दे रहें है तो समस्या तो होगी।
उन शिक्षकों पर हंसी आती है जो सरकारी बैंक की कमी बताते है जबकि अभी पिछले महीने सिर्फ अपने अपने स्कूल के बच्चों का mdm को डिटेल बनाने में परेसान हो गए थे जब कि कोई और काम नही था वंही 4 या 6 ब्रांच ने आपके बनाये पूरे ब्लॉक के डेटा को फीड किया वो भी रोज की बैंकिंग को करते हुए।

Monday, September 7, 2020

निजीकरण

आइए आज बात करते हैं निजीकरण की- यह एक ऐसा मुद्दा है जो किसी एक पोस्ट में समाहित नहीं हो सकता इसलिए इसे कई चरणों में लिख रहा हूं।

        एक शिक्षक होने के नाते सबसे पहले शिक्षा के निजीकरण पर ही लिखता हूं अक्सर लोगों को कहते सुना है की शिक्षक अपने बच्चे को स्वयं निजी स्कूलों में पढ़ाते हैं और खुद नौकरी सरकारी स्कूल में करते हैं वह अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में क्यों नहीं पढ़ाते?
       आपका सवाल जायज है जब सरकारी जॉब अच्छी है सरकारी शिक्षक अच्छा है  तो स्कूल क्यों नहीं?

           जरा सोच कर बताइए क्या आप किसी व्यक्ति को जानते हैं जो किसी सरकारी नौकरी की पूरी योग्यता रखता हो फिर भी वह प्राइवेट शिक्षक बनना पसंद करता है बिना सरकारी में जाने के प्रयास के, संभवत नहीं वह सरकारी शिक्षक बनने की भरपूर कोशिश करता है किंतु किन्ही कारणों से नहीं बन पाता तो वह अपने ज्ञान के आधार पर निजी विद्यालयों में शिक्षण कार्य करता है।
      यानी कहा जा सकता है की नियमतः जो सबसे योग्य होता है वही सरकारी के लिए चयनित होता है तो फिर ऐसा क्या हो जाता है कि जो सबसे योग्य होता है उसका स्कूल कमजोर होता है , असल में कमी शिक्षक की है ही नहीं कमी व्यवस्था की है

          इसको ऐसे समझते हैं एक पैसेंजर ट्रेन मैं बैठा व्यक्ति ट्रेन ड्राइवर को गाली दे यह ट्रेन बहुत धीरे चलाता है और हर स्टेशन पर रोक देता है जबकि निजी ट्रेन बिना रुके कितनी तेज गई है वह ज्यादा स्टेशन पर रूकती भी नहीं है वह ज्यादा साफ भी हैं।
     अब बताइए क्या सच में पैसेंजर ट्रेन के ड्राइवर की गलती है कि ट्रेन धीरे चल रही है ट्रेन साफ नहीं है ट्रेन हर स्टेशन पर रुक रही है या फिर व्यवस्था की गलती है, क्या जो ट्रेन तेज गई उसके ड्राइवर को इस पैसेंजर ट्रेन का ड्राइवर बना दिया जाए तो क्या हुआ पैसेंजर ट्रेन को निजी ट्रेन की तरह चलाएगा अब तो आप समझ गए होंगे गलती ड्राइवर की नहीं है गलती व्यवस्था की है, जैसी सुविधा वाली ट्रेन देंगे जैसा सिग्नल देंगे वैसा ही ट्रेन को पटरी पर दौड़ आएगा यही पैसेंजर का ट्रेन का ड्राइवर जब राजधानी ट्रेन का ड्राइवर बनता है तो बिना रुके चलाता है क्यों क्योंकि उसमें चलाने की काबिलियत तो पहले से थी पर उसे वह व्यवस्था नहीं मिली कि वह तेज चला पाए कुछ ऐसा ही शिक्षा व्यवस्था में भी है गलत व्यवस्था है और दोष शिक्षक पर।

           प्राथमिक स्तर परछोड़ दिया जाए तो कौन है जो आईआईटी प्राइवेट कॉलेज से करना चाहता है कौन है जो डॉक्टर प्राइवेट कॉलेज से बनना चाहता है कौन है जो साइंटिस्ट प्राइवेट कॉलेज से बनना चाहता है आज भी देश के सबसे अच्छे डॉक्टर सबसे अच्छे इंजीनियर सबसे अच्छे वैज्ञानिक सबसे अच्छे मैकेनिक सबसे अच्छे आईएएस सरकारी कॉलेजों के पढ़े ही मिलेंगे और हर कोई उन्हीं सरकारी कॉलेजों में पढ़ना चाहता है वर्तमान में आपने देखा होगा JEE और NEET की परीक्षा के लिए कितना विवाद हुआ क्या सब बच्चे प्राइवेट कॉलेज के लिए परीक्षा दे रहे थे वह टॉप करना चाहते हैं ताकि उन्हें एक गवर्नमेंट कॉलेज मिले।

       क्यों भाई क्यों चाहिए गवर्नमेंट क्या कम फीस के लिए या गुणवत्ता कर लिए, असल में सरकारी कॉलेज नहीं खराब है ना ही शिक्षक खराब है उच्च शिक्षा में सरकार ने ध्यान दिया तो हर कोई सरकारी में ही पढ़ना चाहता है और प्राथमिक पर किसी ने ध्यान ही नही दिया उसे बना दिया पैसेंजर ट्रेन।

     सबसे योग्य शिक्षक की सरकारी में घुस पाते हैं पर अव्यवस्था के चलते वह अपनी प्रतिभा नहीं दिखा पाते हैं।

 
       अक्सर लोग मुझसे पूछ बैठते हैं कि आप सरकारी  शिक्षक हो तो अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में क्यों नहीं पढ़ाते?   मुझे सरकारी स्कूल से दिक्कत नहीं है मुझे वहां के शिक्षक से दिक्कत नहीं है मैं अपने बच्चे को प्राथमिक विद्यालय में भेजने को तैयार हैं बस मेरी भी कुछ शर्त हैं मैं चाहता हूं की मेरा बच्चा जिस विद्यालय में जाएं  वंहा की व्यवस्था भी निजी विद्यालय की तरह हो वह एकदम साफ सुथरा और बढ़िया हो उसमें सभी भौतिक सुविधाएं   उपलब्ध हो हर क्लास को एक शिक्षक उपलब्ध हो और एक प्रधानाध्यपक भी हो, उस स्कूल के शिक्षकों को किसी और कार्य में ना लगाया जाए वहां का शिक्षक सिर्फ और सिर्फ शिक्षण कार्य करें, बेहतर परिवेश मिले, बच्चों को जमीन पर ना बैठना पड़े तो मैं आज ही अपने बच्चे को सरकारी विद्यालय में भेजने को तैयार हूं। क्या आप ये सब देना वंहा के शिक्षक की जिम्मेदारी है
        असल में समस्या शिक्षक की नहीं है समस्या विद्यालय के परिवेश और भौतिक सुविधाओं की है और पर्याप्त शिक्षकों की है, मैं अपने बच्चे को उस विद्यालय में कैसे भेज दूं जिस विद्यालय में 5 क्लास पर 2 ही शिक्षक नियुक्त हैं, मुझे पता ही नही हो कि मेरे बच्चे को कौन पढ़ायेगा जहां पर बैठने के लिए टाट पट्टी है। जहां पर सफाई के लिए कोई स्थाई कर्मचारी भी नहीं है, जहां पर सहयोग के लिए कोई चपरासी भी नहीं है जहां पर सुरक्षा के लिए कोई गार्ड भी नहीं है 2 शिक्षक पांच कक्षाओं को कैसे पढ़ाएंगा मुझे तो लगता है अगर निजी विद्यालय के सबसे योग्य शिक्षकों को भी 5 कक्षाएं दे दी जाएं तो वह भी सर पकड़ कर बैठ जाएंगे साथ ही कुछ अन्य विभागों के काम भी सौंप दिए जाएं तब पूछिएगा कि क्या सच में यह वही शिक्षक है जो प्राइवेट में बहुत अच्छा पढ़ा रहा था सरकारी में आते ही बर्बाद हो गया।
असल मे मुकाबला बराबरी में अच्छा लगता है, निजी विद्यालयों जैसी सुविधा दीजिये, निर्णय लेने का अधिकार दीजिये फिर देखिएगा की कैसे चमत्कार होता है।
तो जब तक निजी जैसी सुविधा नही मिल जाती ये मत कहिएगा को सरकारी शिक्षक अपने बच्चे को सरकारी में पढ़ाए, और ये मांग सिर्फ अपने बच्चे के लिए नही कर रहा सबके लिए कर रहा हूँ।