Sunday, September 13, 2020

देश के हालात

आइये आज 2 खबरों पर चर्चा करतें हैं, सबसे पहले मैं दोनो ही खबर की पुष्टि नही कर रहा।

पहली खबर है कि 5 वर्ष तक आप संविदाकर्मी रहेंगे आगे आप स्थायी होंगे कि नही ये आपके कार्य पर निर्भर करेगा(ऐसा कहा ज रहा है पर निर्भर करेगा आपके अधिकारी पर) एक तरह से 5 वर्ष तक ट्रायल चलेगा कि आप योग्य हो कि नहीं। हमारे कुछ अति आदर्शवादी साथी कह रहें है कि इससे कर्मचारी मेहनती बनेगा और कामचोर कर्मचारी बाहर हो जाएगा तरस आता है उन आदर्श साथियों पर क्योकि इसके शिकार वो खुद बनने वाले हैं।

आइये जानते है उसकी वास्तविकता- 5 वर्ष संविदा पर रखना और मूल्यांकन के बाद स्थायी किया जाना बहुत ही खतरनाक स्थिति होगी असल मे मूल्यांकन कार्य का होगा ही नहीं उसी की रिपोर्ट अच्छी होगी जो अधिकारी का प्रिय होगा चापलूस होगा, जैसा होता है अभी भी हर ब्लॉक में मिलने वाले शिक्षक सम्मान को देखतें ही है कि किसे मिलता है जो अधिकारी के करीब होता है और जो मेहनत से पढ़ाता है उसे तो कोई जानता ही नहीं।
दूसरी बड़ी समस्या जब स्थायी का समय आएगा तो रिपोर्ट अच्छी करने के नाम पर कितना शोषण होगा सबको पता है, ऐसे ही शोषण के चलते तो साक्षात्कार खत्म करने की मांग हो रही है। मतलब साफ है जो चापलूस होगा जो पैसे देगा वो स्थायी होगा जो ईमानदार होगा, अपने काम से कम रहेगा वो बाहर होगा।
उस व्यवस्था से कर्मचारी कभी ईमानदारी से कार्य नही कर पायेगा वो सही गलत पर नही बल्कि सिर्फ वही करेगा जो उसका अधिकारी चाहता है। जैसा कि निजी क्षेत्र में होता है।सबसे बड़ी कीमत तो महिलाओं को उठानी होगी जैसा कि हर निजी क्षेत्र में होता है।
बाकी आप इसको सही कहने के कई बहाने खोज सकतें हैं।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण देता हूँ, नेता जनता के मुद्दों पर चुनाव लड़ता है पर पूरे 5 साल वो जनता के लिए नही पार्टी के हित मे कार्य करता है पार्टी सही करे या गलत आवाज नही उठाता क्योकि उसे पता है कि अगर गलत को गलत बोले तो अगले चुनाव में टिकट कट जाएगा 

दूसरी खबर की वास्तविकता खुद चेक कर लीजिए, अगर गलत हो तो दिन भर सरकारी बैंकों को गाली दीजियेगा कुछ चेक पॉइंट बताता हूँ चेक करें-
निजी बैंक में जाये और निम्न बातें चेक करें-

1 आपकी ब्रांच में कितने अकॉउंट है और कितने कर्मचारी
2 कितने जीरो बैलेंस के खाते हैं
3 कौन कौन सी सरकारी योजना का लाभ मिल सकता है
4 कितने कृषि लोन है
5 कितने जनधन खाते है
6 कितने वृद्धा पेंशन के खाते है
7 कितने विधवा पेंशन के खाते हैं
8 कितने सब्सिडी वाले खाते है
9 कितने मुद्रा लोन दिए है
10 कितने एजुकेशन लोन दिए है
11 कितने छोटे लोगो को स्वरोजगार के लिए लोन दिए है
12 कितने छात्रों के खाते हैं
13 कितने किसान निधि के लाभर्तियो के खाते है
14 कितने mdm के बच्चों के खाते है

ऐसे कुछ सवाल है कुछ खुद से जोड़ लें और पूंछे देखिये जवाब  मिलता है कि नही और मिलता है तो सरकारी बैंक जाइयेगा वंहा के आंकड़े मिलान कर लीजियेगा। विस्वास मानिए आपको   जो भी समस्या हो रही है वो तो रहेगी पर सरकारी बैंकों के प्रति साजिश का पता जरूर चलेगा कि हर दिन एक योजना जोड़ देते है और हर दिन कर्मचारी भी कम कर दे रहें है तो समस्या तो होगी।
उन शिक्षकों पर हंसी आती है जो सरकारी बैंक की कमी बताते है जबकि अभी पिछले महीने सिर्फ अपने अपने स्कूल के बच्चों का mdm को डिटेल बनाने में परेसान हो गए थे जब कि कोई और काम नही था वंही 4 या 6 ब्रांच ने आपके बनाये पूरे ब्लॉक के डेटा को फीड किया वो भी रोज की बैंकिंग को करते हुए।

Monday, September 7, 2020

निजीकरण

आइए आज बात करते हैं निजीकरण की- यह एक ऐसा मुद्दा है जो किसी एक पोस्ट में समाहित नहीं हो सकता इसलिए इसे कई चरणों में लिख रहा हूं।

        एक शिक्षक होने के नाते सबसे पहले शिक्षा के निजीकरण पर ही लिखता हूं अक्सर लोगों को कहते सुना है की शिक्षक अपने बच्चे को स्वयं निजी स्कूलों में पढ़ाते हैं और खुद नौकरी सरकारी स्कूल में करते हैं वह अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में क्यों नहीं पढ़ाते?
       आपका सवाल जायज है जब सरकारी जॉब अच्छी है सरकारी शिक्षक अच्छा है  तो स्कूल क्यों नहीं?

           जरा सोच कर बताइए क्या आप किसी व्यक्ति को जानते हैं जो किसी सरकारी नौकरी की पूरी योग्यता रखता हो फिर भी वह प्राइवेट शिक्षक बनना पसंद करता है बिना सरकारी में जाने के प्रयास के, संभवत नहीं वह सरकारी शिक्षक बनने की भरपूर कोशिश करता है किंतु किन्ही कारणों से नहीं बन पाता तो वह अपने ज्ञान के आधार पर निजी विद्यालयों में शिक्षण कार्य करता है।
      यानी कहा जा सकता है की नियमतः जो सबसे योग्य होता है वही सरकारी के लिए चयनित होता है तो फिर ऐसा क्या हो जाता है कि जो सबसे योग्य होता है उसका स्कूल कमजोर होता है , असल में कमी शिक्षक की है ही नहीं कमी व्यवस्था की है

          इसको ऐसे समझते हैं एक पैसेंजर ट्रेन मैं बैठा व्यक्ति ट्रेन ड्राइवर को गाली दे यह ट्रेन बहुत धीरे चलाता है और हर स्टेशन पर रोक देता है जबकि निजी ट्रेन बिना रुके कितनी तेज गई है वह ज्यादा स्टेशन पर रूकती भी नहीं है वह ज्यादा साफ भी हैं।
     अब बताइए क्या सच में पैसेंजर ट्रेन के ड्राइवर की गलती है कि ट्रेन धीरे चल रही है ट्रेन साफ नहीं है ट्रेन हर स्टेशन पर रुक रही है या फिर व्यवस्था की गलती है, क्या जो ट्रेन तेज गई उसके ड्राइवर को इस पैसेंजर ट्रेन का ड्राइवर बना दिया जाए तो क्या हुआ पैसेंजर ट्रेन को निजी ट्रेन की तरह चलाएगा अब तो आप समझ गए होंगे गलती ड्राइवर की नहीं है गलती व्यवस्था की है, जैसी सुविधा वाली ट्रेन देंगे जैसा सिग्नल देंगे वैसा ही ट्रेन को पटरी पर दौड़ आएगा यही पैसेंजर का ट्रेन का ड्राइवर जब राजधानी ट्रेन का ड्राइवर बनता है तो बिना रुके चलाता है क्यों क्योंकि उसमें चलाने की काबिलियत तो पहले से थी पर उसे वह व्यवस्था नहीं मिली कि वह तेज चला पाए कुछ ऐसा ही शिक्षा व्यवस्था में भी है गलत व्यवस्था है और दोष शिक्षक पर।

           प्राथमिक स्तर परछोड़ दिया जाए तो कौन है जो आईआईटी प्राइवेट कॉलेज से करना चाहता है कौन है जो डॉक्टर प्राइवेट कॉलेज से बनना चाहता है कौन है जो साइंटिस्ट प्राइवेट कॉलेज से बनना चाहता है आज भी देश के सबसे अच्छे डॉक्टर सबसे अच्छे इंजीनियर सबसे अच्छे वैज्ञानिक सबसे अच्छे मैकेनिक सबसे अच्छे आईएएस सरकारी कॉलेजों के पढ़े ही मिलेंगे और हर कोई उन्हीं सरकारी कॉलेजों में पढ़ना चाहता है वर्तमान में आपने देखा होगा JEE और NEET की परीक्षा के लिए कितना विवाद हुआ क्या सब बच्चे प्राइवेट कॉलेज के लिए परीक्षा दे रहे थे वह टॉप करना चाहते हैं ताकि उन्हें एक गवर्नमेंट कॉलेज मिले।

       क्यों भाई क्यों चाहिए गवर्नमेंट क्या कम फीस के लिए या गुणवत्ता कर लिए, असल में सरकारी कॉलेज नहीं खराब है ना ही शिक्षक खराब है उच्च शिक्षा में सरकार ने ध्यान दिया तो हर कोई सरकारी में ही पढ़ना चाहता है और प्राथमिक पर किसी ने ध्यान ही नही दिया उसे बना दिया पैसेंजर ट्रेन।

     सबसे योग्य शिक्षक की सरकारी में घुस पाते हैं पर अव्यवस्था के चलते वह अपनी प्रतिभा नहीं दिखा पाते हैं।

 
       अक्सर लोग मुझसे पूछ बैठते हैं कि आप सरकारी  शिक्षक हो तो अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में क्यों नहीं पढ़ाते?   मुझे सरकारी स्कूल से दिक्कत नहीं है मुझे वहां के शिक्षक से दिक्कत नहीं है मैं अपने बच्चे को प्राथमिक विद्यालय में भेजने को तैयार हैं बस मेरी भी कुछ शर्त हैं मैं चाहता हूं की मेरा बच्चा जिस विद्यालय में जाएं  वंहा की व्यवस्था भी निजी विद्यालय की तरह हो वह एकदम साफ सुथरा और बढ़िया हो उसमें सभी भौतिक सुविधाएं   उपलब्ध हो हर क्लास को एक शिक्षक उपलब्ध हो और एक प्रधानाध्यपक भी हो, उस स्कूल के शिक्षकों को किसी और कार्य में ना लगाया जाए वहां का शिक्षक सिर्फ और सिर्फ शिक्षण कार्य करें, बेहतर परिवेश मिले, बच्चों को जमीन पर ना बैठना पड़े तो मैं आज ही अपने बच्चे को सरकारी विद्यालय में भेजने को तैयार हूं। क्या आप ये सब देना वंहा के शिक्षक की जिम्मेदारी है
        असल में समस्या शिक्षक की नहीं है समस्या विद्यालय के परिवेश और भौतिक सुविधाओं की है और पर्याप्त शिक्षकों की है, मैं अपने बच्चे को उस विद्यालय में कैसे भेज दूं जिस विद्यालय में 5 क्लास पर 2 ही शिक्षक नियुक्त हैं, मुझे पता ही नही हो कि मेरे बच्चे को कौन पढ़ायेगा जहां पर बैठने के लिए टाट पट्टी है। जहां पर सफाई के लिए कोई स्थाई कर्मचारी भी नहीं है, जहां पर सहयोग के लिए कोई चपरासी भी नहीं है जहां पर सुरक्षा के लिए कोई गार्ड भी नहीं है 2 शिक्षक पांच कक्षाओं को कैसे पढ़ाएंगा मुझे तो लगता है अगर निजी विद्यालय के सबसे योग्य शिक्षकों को भी 5 कक्षाएं दे दी जाएं तो वह भी सर पकड़ कर बैठ जाएंगे साथ ही कुछ अन्य विभागों के काम भी सौंप दिए जाएं तब पूछिएगा कि क्या सच में यह वही शिक्षक है जो प्राइवेट में बहुत अच्छा पढ़ा रहा था सरकारी में आते ही बर्बाद हो गया।
असल मे मुकाबला बराबरी में अच्छा लगता है, निजी विद्यालयों जैसी सुविधा दीजिये, निर्णय लेने का अधिकार दीजिये फिर देखिएगा की कैसे चमत्कार होता है।
तो जब तक निजी जैसी सुविधा नही मिल जाती ये मत कहिएगा को सरकारी शिक्षक अपने बच्चे को सरकारी में पढ़ाए, और ये मांग सिर्फ अपने बच्चे के लिए नही कर रहा सबके लिए कर रहा हूँ।

Thursday, August 20, 2020

basic teachers in up

शिक्षकों का ग्रीष्मकालीन अवकाश,समाज का नजरिया और उपार्जित अवकाश
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    अब समय आ गया है कि शिक्षक गर्मी की(40 दिन जिसमें 6 रविवार भी है) छुट्टियों का मोह त्याग दें और 33 el की मांग करें, क्योकि ये 40 छुट्टियां कोढ़ से ज्यादा कुछ नही है किसी काम की भी नही रह गयीं हैं लेकिन बदनामी का कारण जरूर बन गयीं हैं।

अधिकारी कहतें हैं ये ग्रीष्मकालीन छुट्टियां आपकी (शिक्षकों) की नही हैं, बच्चों की हैं। आपको कभी भी बुलाया जा सकता है।जब ये अवकाश शिक्षकों के लिए हैं ही नहीं। तो अन्य कर्मचारियों की भांति शिक्षकों को भी उपार्जित अवकाश संवैधानिक रुप से मिलने चाहिए और न मिलें तो सभी शिक्षक संघों को इसकी मांग करनी चाहिए।

   Earning Leave  मिलने का सबसे बडा फायदा होगा  कि हर किसी की जुबान बन्द हो जाएगी कि हम डेढ़ महीने घर बैठते हैं,दूसरा फायदा जब हमें आवस्यकता होगी तब हमारे पास हमारी छुट्टियां होंगी।इसके अलावा एक और बड़ा फायदा ये है कि अगर आपके पास पूरे कार्यकाल तक 220 छुट्टी हो जाती है तो 1 वर्ष का वेतन मिल जाएगा, तो हुआ न फायदा ही फायदा।
        एक और बात आधे से ज्यादा शिक्षकों का शोषण ही इसी बात से होता है कि 14 cl हैं कभी तो फसोगे, आने वाले समय मे दिक्कत और बढ़ने वाली है क्योंकि पहले तो ज्यादातर शिक्षक होम टाउन तो छोड़िए होम ब्लॉक तक मे थे तो ज्यादा दिक्कत नही आई पर अब तो लोग दूसरे जिलों में नियुक्त हैं और अब तो ट्रांसफर भी जटिल होता जा रहा है।

गर्मी की छुट्टी का लालच देखिये पिछले वर्ष भी जून में जल्दी ही स्कूल खोल दिये गए थे।अभी कोरोना काल मे लॉक डाउन था इसलिये विद्यालय बन्द थे पर अब *धीरे धीरे तमाम जिलों में शिक्षकों को विद्यालय बुलाये जाने सम्बंधित आदेश आप देख सकतें हैं, जबकि शिक्षक पहले से ही राशन वितरण में, स्टेशन पर, बस स्टेशन पर हर जगह लगा रहा आज भी बच्चों के खाते संख्या इकट्ठा करना, शारदा सर्वेक्षण करना जैसी जिम्मेदारी उठा रहे हैं और नाम चल रहा कि गर्मी की छुट्टी चल रही हैं।अगर काम लेना है तो गर्मी की छुट्टी खत्म होने की आधिकारिक घोषणा हो, काम भी करें और छुट्टी का नाम भी रहे ये तो गलत है।

लॉक डाउन में क्या किसी विभाग की El खत्म हुई? नहीं बिल्कुल नहीं, औऱ आपके ग्रीष्मकालीन अवकाश खत्म कर दिये गये और स्कूल उपस्थित होने के आदेश किये गये।जो शिक्षक उपस्थित नहीं हुए उनके वेतन रोक दिये गये हैं।आगे आने वाले समय में भी धीरे धीरे किसी न किसी काम से गर्मी की छुट्टियों में बुलाया जाएगा और नहीं जायेंगे तो वेतन अवरुद्ध होगा फिर वेतन निकलवाने के लिए रिश्वत लो।इसलिए अच्छा होगा कि शिक्षक स्वयं ग्रीष्मकालीन अवकाश का वॉयकाट करें।
     रिकॉर्ड में और समाज मे ये दर्ज है कि शिक्षक की गर्मी की छुट्टी चल रही है पर शिक्षक तो विद्यालय में है।

अब समय आ गया है गर्मी की छुट्टी रद्द कराने और el शुरू कराने का।

#सभी_शिक्षक_संघो के पदाधिकारियों से निवेदन है कि अगर आपके बस का कुछ है तो आप अर्न लीव की आवाज बुलंद करें।

Tuesday, August 18, 2020

मोह गर्मी की छुट्टी का

*मोह गर्मी की छुट्टी का-*

अब आप इसे संयोग कहें या फिर तुक्का पर जो कहा वो हुआ है, बस फर्क इतना है कि मैं बहुत पहले कह देता हूँ तो लोग विस्वास ही नही करते।

     *जो लोग मुझसे जुड़े है उन्हें याद होगा 2 वर्ष पहले एक मुद्दा उठाया था कि अब समय आ गया है कि शिक्षक गर्मी की(40 दिन जिसमें 6 रविवार भी है) छुट्टियों का मोह त्याग दें और 33 el की मांग करें, क्योकि ते 40 छुट्टियां कोढ़ से ज्यादा कुछ नही है किसी काम की भी नही है और बदनामी का कारण जरूर है।* 

           अधिकारी कहतें है ये छुट्टियां आपकी नही है बच्चों की है आपको कभी भी बुलाया जा सकता है, हम शिक्षक भी इन छुट्टियों को जबरजस्ती काटते हैं, और जब शिक्षक को जरूरत होती है तो कोई छुट्टी नही होती, पर शिक्षक इस बात को समझता ही नही की गर्मी की छुट्टी से बेहतर el रहेगी।

   *El मिलने फायदे ही फायदें है सबसे पहले तो यही फायदा की हर किसी की जुबान बन्द हो जाएगी कि हम डेढ़ महीने घर बैठते हैं, सबसे बड़ा फायदा जब हमें आवस्यकता होगी तब हमारे पास हमारी छुट्टियां होंगी एक और बड़ा फायदा ये है कि अगर आपके पास पूरे कार्यकाल तक 220 छुट्टी हो जाती है तो 1 वर्ष का वेतन मिल जाएगा, तो हुआ न फायदा ही फायदा, एक और बात आधे से ज्यादा शिक्षकों का शोषण ही इसी बात से होता है कि14 cl है कभी तो फसोगे, आने वाले समय मे दिक्कत और बढ़ने वाली है क्योंकि पहले तो ज्यादातर शिक्षक होम टाउन तो छोड़िए होम ब्लॉक तक मे थे तो ज्यादा दिक्कत नही आई पर अब तो लोग दूसरे जिलों में नियुक्त हैं और अब तो ट्रांसफर भी जटिल होता जा रहा है तो कैसे करेंगे 14 cl में सबकुछ।*

    गर्मी की छुट्टी का लालच देखिये पिछले वर्ष भी जून में जल्दी ही स्कूल खोल दिये गए थे, अभी कोरोना काल मे लॉक डाउन था इसलिये विद्यालय बन्द थे पर अब *धीरे धीरे तमाम जिलों में शिक्षकों को विद्यालय बुलाये जाने सम्बंधित आदेश आप देख सकतें हैं, जबकि शिक्षक पहले से ही राशन वितरण में, स्टेशन पर, बस स्टेशन पर हर जगह लगा रहा आज भी बच्चों के खाते संख्या इकट्ठा करना, शारदा सर्वेक्षण करना जैसी जिम्मेदारी उठा रहे हैं और नाम चल रहा कि गर्मी की छुट्टी चल रही है,* अगर काम लेना है तो गर्मी की छुट्टी खत्म होने की आधिकारिक घोषणा हो, काम भी करें और छुट्टी का नाम भी रहे ये तो गलत है।

लॉक डाउन में क्या किसी विभाग की El खत्म हुई? नहीं बिल्कुल नहीं, औऱ आपकी? 

आगे आने वाले वर्षों में ही धीरे धीरे किसी न किसी काम से गर्मी की छुट्टियों में बुलाया जाएगा, मै तो कहता हूँ कि शिक्षक स्वयं कहे कि हमे नही बैठना है घर जब जरूरत होगी तब दीजिये छुट्टी।

   *अब अपने नवाचारी साथियों से निवेदन है कि आप सरकार के साथ रोज नए नए प्रयोग करते रहतें है कोई प्रयोग ऐसा करिये की सरकार को समझ मे आ जाये कि शिक्षक को गर्मी की छुट्टी नही देनी है बल्कि EL देना ठीक होगा। थोड़ा नवाचार शिक्षक हित मे भी करिये या बस सरकार को खुस रखना है बस*

रिकॉर्ड में और समाज मे ये दर्ज है कि शिक्षक की गर्मी की छुट्टी चल रही है पर शिक्षक तो विद्यालय में है।

अब समय आ गया है गर्मी की छुट्टी रद्द कराने और el शुरू कराने का।

Tuesday, August 11, 2020

कड़वी हकीकत

*एक_कङवी_सच्चाई*
हर गाँव का हाल 

भारतीय  युवा इन 2-4 सालों से पता नहीं किन लोगों के प्रभाव में आकर चकाचौंध की दुनियां में खोते जा रहे हैं। 
सबसे ज्यादा असर पड़ा है सोशल मीडिया नेटवर्किंग का। जिन भाइयों को पढ़ाई, कोचिंग, भर्ती, कम्पीटिशन 
पर फोकस करना चाहिए 
वो फेसबुक पर नई नई स्टोरी लगाने, वाट्सएप पर स्टेटस लगाने,नए लुक में अपडेट होने, हरियाणवी लहजे में डॉन बनने, साथियों का एक ग्रुप बनाकर गैंगस्टर टाईप छवि बनाने, तेज स्पीड में बाइक चलाने,
 मुर्गे जैसी कटिंग और औरंगजेब सी दाढ़ी रखने, सारे दिन पब्जी खेलने टिक टोक के दीवाने, होटल मिडवे पर जाकर बर्थडे सेलिब्रेशन, रोड़ किनारे बैठकर बियर पीने, शराब ठेकों पर झगड़ा करने, अपने आप को पोलिटिकल किंग मेकर समझने, उधारी के पैसों से गांजा, चरस, दारूपीने,सिगरेट फूंकने, हथियार लहराने का शौक रखने, डायलॉग बाजी करने के प्रति ज्यादा झुकते दिखाई दे रहे हैं और उनमें अधिकांशतया ग्रामीण पृष्ठभूमि के निम्न मध्यम वर्गीय किसान परिवारों के बच्चे हैं 
जिनमे उनके परिजन उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद रख रहे हैं 
परंतु ये मुर्गा कटिंग वाले डीजे के डांसर अलग ही दुनिया में  जा रहे हैं। 

दरअसल वैसे यह कल्चर कमोबेश हर क्षेत्र में बढ़ती जा रही है और इसके पीछे जो लुभावनी चीज है वह है चमक दमक का आकर्षण। 
पड़ौसी राज्यों जैसे सम्पन्न प्रदेश के युवा अगर कुछ कर रहे हैं तो वो आलरेडी सम्पन्न हैं, और सम्पन्न होने के बावजूद भी उन प्रदेशो में होते जा रहे सामाजिक पतन की भी बातें सुनने में आ रही हैं, परन्तु हमारे यहां के युवा , खासकर जो अभी अभी युवा बन रहे हैं या बनने जा रहे हैं, उनके हाथों में एंड्रॉयड फोन आते ही इन फर्जी लठेतों को, और उनके फेसबुकिया ठाठ देखकर बहुत जल्दी वैसे ही दिखने बनने की दिशा में चल निकलते हैं। पर इन प्रदेशों की अच्छाई की तरफ इनका ध्यान नहीं जाता ,हरियाणा पंजाब के बहुत से युवा साथी खेलों में मैडल ला रहे हैं, IAS में टॉप कर रहे हैं। उनसे सीखें कुछ । पर नहीं , इनको तो गड्ढे में गिरने की सनक लगी है।
 फिर शुरू होता है इनके....यारां दा अड्डा, जिगरी......,यादव सरकार, रॉयल राव साब, धांसू गुज्जर, जिगरी जाट, देसी बॉयज, गामा हाले छोरे, यारां दी बादशाहत, सोपू, 007......,ब्रांड फलाना ,रंगबाज ठाकुर , वगेरा वगेरा जैसी गैंग नुमा लड़को की टोली बनना और दिखावटी चोंचले बाजी। काम के नाम पर माफिया लोगो के साथ सेल्समेनी, टोल प्लाजा पर काम, रॉयल्टी नाको पर काम, जिनमे 5-7 हजार से ज्यादा कुछ मिलता नही पर वहां फोकट की दारू, रोटीया & चकाचौंध की दुनियां, डोडा पोस्त-अफीम तस्करों के प्यादे बनना.....जो सारा करियर बिगाड़ के रख दे रही है। 

दूसरा कारण लोकल राजनीति भी इसमे सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। आजकल के चुनावी सीजन में हर नेता को इन फेसबुकिया युवाओं की टीम चाहिए जो 5-7 गाड़ीयों में भरकर जिंदाबाद के नारे लगाते रहे, हर रात उन्हें चुनाव के दौरान फ्री की शराब और खाने पीने की सुविधा , ऐसे माहौल में ये नासमझ उन नेताओं को अपना गॉडफादर समझने लग जाते हैं और नेताजी का भविष्य तो सुरक्षित पर खुद का भविष्य चौपट।

तीसरा परिवार व समाज की अनदेखी ओर निष्क्रियता....आज समाज और परिवारों में इतना विखंडन बढ़ गया कि अगर पता भी चल जाता है कि कौन गलत दिशा में जा रहा है तो भी हम कोई कठोर कदम नही उठा पाते, इसका एक कारण बुरा बनने से बचने की भावना भी है, पहले गांव में कोई बदमाशी करता तो गांव के दूसरे लोग ही टोक देते थे, अब कोई किसी को नहीं टोकता, और टोके भी कैसे बेचारे की उसी की बेइज्जती कर दें। परिवार वालो की सुनते नही, फिर परिवार के लोग भी सोच लेते हैं कि " कुएं में पड़े और भाड़ में जा" पर स्तिथि धीरे धीरे जड़ें मजबूत करती जा रही है।
फिर ये भटके जीव हो जाते हैं अविवेकी और कुंठित, गुस्सा इनके नाक पर, कोई कुछ बोल दे तो मरने मारने को तैयार, शौक पूरे करने के लिए हर हद तक जाने को तैयार।
बढ़ते नशे के प्रचलन, अवैध हथियारों के शौक, इश्कबाजी और गैंग्स प्रवृत्ति ने हमारे क्षेत्र के बहुत से युवाओं को बर्बादी की ओर धकेल दिया है। 
अपराध संबंधी इन दिनों घट रही घटनायें इसकी बानगी है आने वाले समय मे ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति बार बार हो सकती है। अभी समय है हमारे पास कि हम सचेत और जागरूक होकर इस बर्बादी के रास्ते पर अंकुश लगा सकें। इसके लिए सभी समाज के जिम्मेदार नागरिकों को,सबको जागरूक होकर उचित कदम उठाने होंगे, नहीं तो हमारा युवा वर्ग नकारात्मक मार्ग पर इतना आगे बढ़ जाएगा कि पछतावे के अलावा कुछ नहीं होगा ।

पर साथियों इस चकाचौंध से बाहर निकलो एक अच्छी दुनिया है जिसे आप  अपने व अपने परिवार के लिए जिऐं।

एक बार फिर आपसे यही प्रार्थना है कि इस जातिगत और धार्मिक कट्टरता पर ध्यान ना देकर आप अपने परिवार व अपने लिए जिया जाए। 
   

            🙏🙏

Sunday, August 9, 2020

कोरोना और परीक्षा

एक तरफ कोरोना प्रदेश भर में हर दिन नई स्पीड से बढ़ रहा जिसको रोकने की सारी जिम्मेदारी सीधा जनता के कंधों पर डाली जा चुकी है दूसरी तरफ प्रशासन द्वारा लगातार कोरोना को बढ़ने का मौका दिया जा रहा है।

एक तरफ तो आदेश आया कि अगर बाइक पर पीछे पत्नी के अलावा कोई और बैठा तो चालान किया जाएगा ये कोरोना रोकने का प्रयास है या आपदा को अवसर बनाया जा रहा है। अगर घर मे बहन है उसे कंही जाना है तो कैसे जाए माता पिता जी कैसे जाए बाप बेटी कैसे जाए? नियम ऐसे बनाइये जो व्यवहारिक हों।

अब दूसरा पहलू देखिये अभी तक पता नही है कि स्कूल कॉलेज कब खुलेंगे पता नही है जिनके एडमिशन हुए है उनकी पढ़ाई तो बन्द है, जितने B. ED कर चुके है उनके भविष्य का पता नहीं पर नए एडमिशन की इतनी क्या जल्दी थी जो कोरोना के हाहाकार के बीच ही प्रवेश परीक्षा करा दी, लाखो युवा भविष्य बचाने के लिए जीवन ही दांव पर लगा कर परीक्षा देने गए।
जब भी ऐसी परीक्षाएं हुई है रोड जाम हो जाती रही हैं सबको पता था कि सोशल डिस्टेंस मेंटेन कर पाना सम्भव ही नही होगा और वही हुआ सोसल डिस्टनसिंग की धज्जियां उड़ गई।

अगले सप्ताह पुनः ऐसी ही एक बड़ी परीक्षा होने वाली है जिसमे भीड़ होगी और कोरोना ब्लास्ट का खतरा बढ़ेगा।

अब जरा बताइये किसी लड़की को पेपर देना होगा तो पहले वो अपने लिए दुल्हा खोजे तब जाए।

नीचे फ़ोटो देखिये और बताइये क्या इन सभी अभ्यर्थियों का महामारी एक्ट के तहत चालान नही होना चाहिए, अब बस चालान और हो जाये तो कसर पूरी हो जाये।

अगर सब कुछ नार्मल है तो शिक्षकों के ट्रांसफर पर ही काहे कोरोना चिपका हुआ है। अब तो लगता है कि हर वो का हो रहा है जिससे कोरोना फैले, अगर 50,000 लोगो का ट्रांसफर हो जाता तो वो भी एक शहर से दूसरे शहर का सफर न करते तो लाखों लोग सेफ हो जाते।

बाकी हम सबको मौन रहना चाहिए क्योंकि अगर गलत को गलत कह दिया तो सरकार का विरोध हो जाएगा और एक देश प्रेमी को किसी भी दशा में सरकार के विरोध से बचना चाहिए, वैसे भी मरता सिर्फ शरीर है आत्मा अजर अमर है।