Tuesday, June 9, 2020

निष्ठुर नियति और बेरोजगारी का दंश

निष्ठुर नियति और बेरोजगारी का दंश

उत्तर प्रदेश में युवाओं के लिए रोजगार पाना निष्ठुर नियति बनकर रह गया है। इतनी बड़ी आबादी के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी बढ़ जाना स्वाभाविक है। बेरोजगार युवा पढ़ लिखकर मेहनत करके आगे बढ़ने कुछ बनने का सपना देखता है। इस सपने को धरातल पर मूल रूप देने में अपनी नींद तक का त्याग कर देता है। लेकिन इतनी मेहनत के बाद भी निष्ठुर नियति उनकी राह के कांटे की तरह बनकर आ खड़ी होती है। इसे दुर्भाग्य कहे या व्यवस्था की खामी, हर भर्तियां कॉमेडी शो की तरह बेरोजगारों के साथ मजाक करने में लग जाती है। हर भर्तियां आवेदन, परीक्षा, उत्तरमाला के बाद कोर्ट कचहरी के रास्ते से होकर नियुक्ति तक पहुँचती है। छोटे से लेकर बड़े आयोग कोई भी इससे अछूते नही रहे। वर्तमान में गतिमान 69 शिक्षको की भर्ती भी हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीमकोर्ट की परिक्रमा लगाने के बाद डेढ़ वर्ष पश्चात प्रारम्भ ही हुई कि उसी दिन पुनः हाईकोर्ट ने रोक लगा दी। पिछले सालों में कोई भी भर्ती प्रक्रिया नही रही जिसमे कोई न कोई विवाद न हुआ हो चाहे 72825 शिक्षको की भर्ती हो जिसे पूरे होने में 5 वर्ष लग गए और इस दौरान तीन सरकारे बदल गयी। प्रदेश में हर शिक्षक भर्ती चाहे प्राथमिक हो या माध्यमिक सभी में प्रश्न पत्र से लेकर उत्तरमाला और परिणाम तक विवाद में रहे और ये सभी हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीमकोर्ट तक पहुंचे। इन्ही विवादो की वजह से प्रक्रिया को पूरी होने तीन से चार वर्ष तक लग गए। अभी भी प्रदेश में कई शिक्षको को भर्तियां इन्हीं प्रकार के विवादों की वजह से 3 से 4 वर्ष से लंबित हैं। यही नही इन्ही शिक्षको के स्थानांतरण की भी प्रक्रिया पिछले 6महीने से गतिमान है जोकि अभी तक पूर्ण नही हो सकी है। प्रदेश में सबंधित संस्थाओं को गम्भीरता से सोचना चाहिये , जिससे इस प्रकार के अनुचित अहित से किसी प्रदेशवासी को सामना न करना पड़े।

सुधेश पाण्डेय

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