चीन की करतूत आज से नही बहुत दिनों से उजागर है वो घटिया हरकतों पर उतरा हुआ है और उसके इस रवैये की असली वजह है उसका पैसा है, आप सामान्य जीवन मे भी देखिए जिन लोगो के पास थोड़ा ज्यादा पैसा हो जाता है वो कैसे उलझते रहतें हैं।
बस चीन का भी दिमाग उसके पैसे ने खराब कर दिया है, अब सवाल ये उठता है कि इसका उपाय क्या है? क्या युद्ध बेहतर रहेगा? क्या युद्ध से सिर्फ चीन का नुकसान होगा हमारा नही? कुत्ते को मारने के लिए क्या आप अपनी औलाद खोएंगे? जो लोग इसका इलाज सिर्फ युद्ध बता रहें है वो भावना में बोल रहे है युद्ध हुआ तो यही लोग पहले चिल्लायेंगे क्योंकि दिक्कत हमें भी उठानी पड़ेगी।
जरूरी नही है कि हर लड़ाई युद्ध के मैदान में लड़ी जाए दुश्मन को हराने के और भी बेहतर उपाय है जिससे दुश्मन बर्बाद भी हो जाएगा और हमें अतिरिक्त फायदा भी हो जाएगा, चीन की असली ताकत उसका व्यापार, उसकी सस्ती तकनीक है हमें उस पर चोट करनी होगी और ये एक दिन में नहीं होगा समय तो लगेगा पर स्थायी इलाज यही है।
आज चीन हमारे घर मे घुस चुका है आपको पता भी नही होगा कि कितने प्रोडक्ट आपके पास चीनी है हर दूसरा समान चीनी होगा या फिर कोई न कोई पार्ट चीनी होगा, हद तो यंहा तक है कि हमारे भगवान की मूर्तियां भी चीन बनाता है, डायरेक्ट या इनडाइरेक्ट रूप से बहुत से चीनी सामान इस्तेमाल करतें हैं,हम न चाहते हुए भी चीनी समान पर निर्भर हो गए क्योंकि चीनी समान बहुत सस्ता होता है, जब बात हमारी जेब पर आती है तो हम देशभक्ति भूल अपना बजट संभालते हैं, चीन हमारे घरों में एक दिन में नही पहुंचा है धीरे धीरे पहुंचा है अब इसे भगाया भी एक दिन में नही जा सकता पूरी तैयारी से धीरे धीरे कार्य करना होगा।
हमारे पास दुनिया मे सबसे ज्यादा कामगार है पर वो कुशल नही है इसलिए बहुत ज्यादा श्रम बर्बाद होता है, सबसे बड़ी कमी हमारी शिक्षा व्यवस्था में है वर्तमान शिक्षा ऐसी है कुछ लाख को तो कुशल बना देती है पर करोड़ो पढ़े लिखे बेरोजगारों की फौज खड़ी कर देती है क्योंकि उन करोड़ो के पास कोई हुनर नही होता इसलिए वो सरकारों का मुह ताकते रहतें है और 18 वर्ष की उम्र से 36 वर्ष तक भटकते हुए बीत जातें है मतलब 18 ऊर्जावान वर्ष बर्बाद हो जातें है।
मेरे अनुसार हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था में नैतिक शिक्षा और औद्योगिक शिक्षा को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए, शुरुआती शिक्षा से ही कुछ समय हुनर निखारने में जरूर देना चाहिये।
औद्योगिक शिक्षा की सबसे ज्यादा आवस्यकता बेशिक शिक्षा के स्कूलोँ में है क्योंकि इन स्कूलों में उस तबके के बच्चे पढ़ते है जो 90% छात्र आठवीं तक मुश्किल से पढ़ते है और उसके बाद वो जीवकोपार्जन में लग जातें है और बिना किसी हुनर केउन्हें अच्छी मजदूरी भी नही मिलती, किंतु अगर बेशिक शिक्षा में हुनर निखार पर जोर दे दिया जाए तो जब बच्चे स्कूल से निकलने के बाद बेहतर हुनर के साथ बेहतर पैसा कमाएंगे तो बच्चों और अभिभावकों की सोच स्कूल के लिए बदलेगी जिससे देश की गरीबी भी कम होगी और कुशल कामगार होने पर देश हर चीज का उत्पादन सस्ते में कर सकेगा।
मेरे अनुसार चीन ही नहीं पूरी दुनिया को पछाड़ने का यही बेहतर तरीका है चीन भी कुछ ऐसा ही करता है, भारत मे बिकने वाले ज्यादातर खिलौने और बिजली के समान चीन के स्कूलों में बनते हैं बाद में यही बच्चे निपुड़ हो खुद का कारोबार शुरू करतें है।
देश पर शहीद होने वाले सिपाहियों को हम नमन करतें हैं।
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